पिछले कई दिनों से महरी की ग़ैरहाज़री में मैं
उसकी भूमिका में थी, तो लेखन के लिए समय नहीं
बच रहा था। इस मामले में स्कूल में पढ़ा, रामवृक्ष
बेनीपुरी निबंध, ‘गेहूं और गुलाब’ याद आता है। निबंध की पंक्तियां तो समय की धूल से अट चुकी
हैं, लेकिन सार आज भी याद है, ‘‘गेहूं हम खाते हैं, गुलाब सूंघते हैं। एक से शरीर की पुष्टि होती
है, दूसरे से मानस तृप्त होता है।’’ खुद को इस लायक़ तो नहीं समझती कि इस निबंध की
व्याख्या कर सकूं लेकिन इस शीर्षक के सन्दर्भ में एक बात ज़रूर समझ में आती है कि
जब घर की कोठरी में गेहूं भरा हो, तभी बग़ीचे में
लगा गुलाब अच्छा लगता है।
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