Monday, 6 January 2025

Sanjay Kumar भाई की किताब #आओ_गौरैया में प्रकाशित मेरी कहानी #आशियाना

 

पढ़ें,Sanjay Kumar भाई की किताब #आओ_गौरैया में प्रकाशित मेरी कहानी #आशियाना। 

70 के दशक का अंतिम भाग। हम स्कूली बच्चे दो ही चीज़ों से जागते थे, या तो मां-बाप की फटकार से, या फिर गौरैया की चूं-चूं से। घर के अलग-अलग कोनों में लगे घोसलों से, इन बे-बुलाए मेहमानों की चहचहाहट सुबह-सुबह घर के हर सदस्य को अनजानी खु़शी दे जाती थी। 

तिनके-तिनके से जोड़े घरौंदों के तिनके कभी-कभी नन्हीं चोंचों से छूटकर फ़र्श पर गिर जाते, और उस दिन दो लोगों का काम बढ़ता, अम्मी का और उस प्यारी-सी चूंचूं का।

‘‘कमबख़्त घर कितना गंदा कर जाती है।’’ घर की सफ़ाई के वक़्त अम्मी के मुंह से रोज़ रटा-रटाया वाक्य निकलता।

‘‘अरे फ़ातमा, ऐसे मत बोलो, नन्हीं सी जान को। ये समझ लो कि इसकी चहचहाहट घर में बरकत लाती है।  बड़े-बूढ़ों के मुंह से हमेशा से सुना है कि जिस घर से गौरैया चली जाती है, उस घर की बरकत भी चली जाती है।’’ 

मेरी नानी घर की बरकत के मामले में कोई समझौता नहीं करती थीं, और बरकत के नन्हें फ़रिश्ते, यानी गौरैया के लिए अपनी बेटी यानी, मेरी अम्मी को डांट पिलाने से बाज़ नहीं आती थीं।

‘‘अच्छा भई अम्मा, अब कोई कुछ नहीं कहेगा, तुम्हारी इन प्यारी चिड़ियों को, हो जाएगी, सफ़ाई।’’ अम्मी चिढ़तीं, झुंझलातीं, मगर फिर चिड़ियों की फैलाई गंदगी साफ़ कर देतीं। 

‘‘और सुनो फातमा, चावल फटककर जो भी खुद्दी निकलेगी, चिड़ियों को ज़रूर डाल देना।’’ नानी का एक और फ़रमान अम्मी के लिए आता था। 

नानी जब भी मुज़फ्फरपुर से हमारे घर राँची आतीं, उनकी यह हिदायतें जारी रहतीं। मैं रोज़ अम्मी, और नानी, दोनों ही को गौरैयों के लिए खुद्दी, और छायादार जगह पर मिट्टी के बर्तन में पानी रखते देखा था। कब अनजाने में इन पंखों वाले मेहमानों से मेरा दिल जुड़ गया, पता ही नहीं चला। गौरैयों को अपने घर बुलाने की केाशिश में अब मैं भी उनके लिए दाना-पानी रखती।

‘‘चूं-चूं, चूं-चूं, चूं-चूं!’’ उस संडे की सुबह पूरा घर जैसे उस मादा गौरया ने अपने सिर पर उठा रखा था। उसकी बेचैनी देखते बनती थी। वह कभी अपने घोसले में जाती, कभी फुर्र से उड़कर नीचे की ओर आती, कभी खिड़की पर जा बैठती। 

‘‘आखिर बात क्या है? हेना ज़रा देखो तो, चिड़िया क्यों इतना शोर मचा रही है।’’ अम्मी ने मुझे आवाज़ लगाई। 

मैंने जाकर देखा तो, गौरैया का एक नन्हा सा बच्चा, घोसले से नीचे गिरकर ज़मीन पर चिचिया रहा था और उसकी मां उस के लिए तड़प रही थी। मगर शायद घर में रहने वाले इंसानों का डर था, या कोई और वजह, कि उसे उठाकर ले जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। ऊपर वाले ने मां को कुछ ऐसा ही बनाया है, फिर वह इंसान हो, परिंदा हो, या चरिंदा; मां की ममता हर प्राणी में एक जैसी होती है। आज यहां भी एक मां तड़प रही थी, और दूसरी तरफ़ उसकी ममता के लिए उसका बच्चा तड़प रहा था। बीच में मैं थी, तमाशाबीन बनी, भौंचक खड़ी। कभी मां को देखती, कभी बच्चे को। मेरी बालबुद्धि में बस एक ही बात आ रही थी कि इस समस्या का हल इसकी मां के पास नहीं, तो मेरी मां के पास तो ज़रूर होगा। मैंने नीचे बैठकर बड़ी नज़ाकत से उस नन्हे बच्चे को अपनी हथेली में उठाया, और पूरी फुर्ती के साथ किचेन की ओर भागी, जहां अम्मी सुबह के नाश्ते की तैयारी में जुटी थीं। 

लेकिन किचेन तक पहुंचने के पहले ही मुझे अपने हाथ पर हल्की सी चुभन महसूस हुई। मैंने तड़पकर देखा तो उस चुभन वाली जगह पर बहुत महीन सी चोट थी, जिससे खून की एक बूंद छलक गई थी। ग़नीमत था कि नन्ही गौरया मेरे दाएं हाथ में थी, और मेरा बायां हाथ घायल हुआ था। अभी दो लम्हे पहले ही मैंने अपने बाएं कान के पास हल्की सी फुर्र की आवाज़ भी सुनी थी। आंखों ने आवाज़ का पीछा किया और दिमाग़ ने सब कुछ साफ कर दिया। 

हुआ यूं था कि उस नन्ही गौरैया की मां ने मेरे बाएं हाथ पर चोंच मारी थी। यह हमला असुरक्षा में किया गया था, या क्रोध में, यह तो पता नहीं लेकिन उस मां की नज़रों में मैं गुनाहगार थी, जिसने उसके बच्चे का अपहरण किया था। बहरहाल, अपने हाथ पर उभर आई खून की उस बूंद को नज़रअंदाज़ करते हुए मैं अम्मी के पास पहुंची, और उन्हें पूरा माजरा कह सुनाया। उन्होंने चूल्हे पर चढ़ा तवा तुरंत उतारकर किनारे किया, हाथ धोए, और उस डरे-घबराए बच्चे को बहुत संभालकर अपने हाथ में ले लिया। वह शायद समझ रही थीं कि मेरा वह छोटा सा घाव इंतज़ार कर सकता है, मगर ज़िन्दगी, और मौत से जूझ रहा चिड़िया का वह बच्चा नहीं। 

‘‘अच्छा जाओ, जाकर जल्दी से हाथ धोओ, और बोरोलिन लगा लो।’’

 चिड़िया के बच्चे को संभालते हुए उन्होंने मुझे हिदायत दी। मगर मैं भला कहां वहां से हिलने वाली थी! मैं वहीं खड़ी उन्हें उस बच्चे को संभालते देखती रही। काफ़ी देर तक सहलाने के बाद उसका थरथराना रुका। अम्मी ने एक चम्मच में थोड़ा सा पानी लेकर उसकी चोंच के आगे लगा दिला। बच्चे ने अपनी क्षमता भर पानी पिया, और आराम से उनकी हथेली पर बैठ गया। करूणा के सामने डर कमज़ोर पड़ गया था। मगर उसकी मां की बेचैनी अपनी बनी हुई थी। इसीलिए हर थोड़ी देर पर एक बार फुर्र की आवाज़ आती, वह चक्कर लगाती, और अपने बच्चे को देख जाती। 

लगभग आधे घंटे तक यही सिलसिला चला। नाश्ते में देर हो रही थी, और उधर गौरैया का बच्चा अब ठीक लग रहा था। इसलिए, अम्मी ने उसे संभालकर घोसले के नीचे रख दिया, और फिर उनकी हिदायत आई, घर के सारे सदस्यों के लिए,

‘‘सुनो, जबतक वह चिड़िया अपने बच्चे को घोसले में ले नहीं जाती, तब तक कोई उधर से नहीं गुज़रेगा। कोई भी आहट होने पर डर जाएगी, और बच्चा पड़े-पड़े दम तोड़ देगा।’’

अम्मी के डर से हम भाई-बहनों में से कोई उधर से नहीं गुज़रा, हम सबने माहौल बना रखा था ताकि मां-बच्चे का मिलन हो जाए। मगर दबे पांव छिपकर कमरे से बाहर झांकना हम नहीं भूल रहे थे। बच्चा अभी तक अपनी जगह था, और मां समय-समय पर उसके चक्कर काट रही थी।

दोपहर हो चुकी थी। घर के कामों से फ़ारिग़ होने पर अम्मी का ध्यान अब अपने बच्चे, यानी मेरी ओर गया क्योंकि मैं अपने बिस्तर पर पड़ी थी। उन्होंने मेरे हाथ पर बने ज़ख़्म पर दवा लगानी चाही तो उनके मुंह से सिसकारी निकल गई, ‘‘अरे, इसे कितना तेज़ बुख़ार है! बेटा, हेना, हेना।’’ मेरा शरीर सचमुच तप रहा था।

उन्होंने मेरा गाल थपथपाया। मां का स्पर्श पाकर मैंने आंखें खोल दीं। 

‘‘अम्मी, चिड़िया का बच्चा अपने घोसले में गया?’’मेरी कराहती हुई आवाज़ निकली। 

‘‘अरे तुम क्यों फ़िक्र करती हो, उसकी मां उसको ले जाएगी, न?’’ अम्मी ने ठंडे पानी में डूबे कपड़े की पट्टी मेरे माथे पर चढ़ाते हुए कहा।

उस दिन रात भर मैं बुखार से तपती रही। अम्मी पूरी रात मेरे सिराहने बैठी मेरे माथे पर पट्टी चढ़ाती रहीं। 

‘‘चिड़िया का बच्चा, चिड़िया का बच्चा।’’ मैं हर थोड़ी देर पर चिंहुक उठती, 

‘‘चिड़िया के बच्चे को उसकी मां ले गई।’’ अम्मी हर बार मुझे थपककर सुला देतीं। लेकिन मेरी अस्पष्ट बड़बड़ाहट पूरी रात चलती रही। यह बुखार चिड़िया के हमले की दहशत का था, या मां-बच्चे के अलग होने के सदमे का, यह बात कभी न तो मुझे समझ आई, न मेरे परिवार को। 

सुबह हुई तो रात की स्याही के साथ-साथ मेरा बुखार भी चला गया। आंख खुलते ही मुझे अच्छा महसूस हो रहा था। सोमवार था। स्कूल जाने की मजबूरी थी। इसलिए, उठकर तैयार होना भी ज़रूरी था। मगर उसके पहले, एक और ज़रूरी काम बाक़ी था। मैं भागकर घर के उस कोने में पहुंची, जहां अम्मी ने कल गौरया के बच्चे को संभालकर रखा था।

आज वह बच्चा भी नहीं था, और घोसले से आने वाली चहचहाहट भी नहीं थी। 

मैंने खिड़की पर चढ़कर घोसले में झांका, तो दिल बैठ गया। घोसला ख़ाली पड़ा था। सदमे के कारण मैं अगले चार दिनों तक फिर बुखार में पड़ी रही, चिड़िया के लिए कलपती, तड़पती। मेरी देखभाल के साथ-साथ अम्मी ने चिड़िया और उसके परिवार के इंतज़ार में दाना-पानी रखना नहीं छोड़ा।

मेरे बुखार के बाद की पांचवीं सुबह था। मुझे अपने माथे पर अम्मी का स्पर्श महसूस हो रहा था, और कानों में उनकी हल्की-हल्की आवाज़ आ रही थी, 

‘‘हेना, चिड़िया अपनी पूरी फ़ैमिली के साथ घोसले में वापस आ गई है।’’

उस एक जुमले ने जैसे संजीवनी बूटी का काम किया। मैं उठ कर खड़ी हो गई, धीरे-धीरे चलते हुए घोसले के पास पहुंची। वहां ज़मीन पर बिखरे तिनके और खुद्दी के दाने चिड़िया की घर वापसी की सूचना दे रहे थे। घोसले से जानी-पहचानी चूं-चूं की आवाज़ें आ रही थीं। 

‘‘बेटा, एक बात हमेशा के लिए समझ लो। कभी भी चिड़िया के बच्चे या उसके घोसले को हाथ मत लगाना। अजीब सी बात है कि इंसानी हाथ लगने के बाद चिड़िया अपने बच्चे, और घोसले को छोड़ देती है। या तो तुम्हारी दुआ का असर था, या कोई और चमत्कार; कि चिड़िया ने अपने घोसले को दोबारा आबाद किया है, वह भी पूरे परिवार के साथ।’’

फिर बहुत लंबे समय तक चिड़ियों ने हमारा घर गुलज़ार रखा। सालों गुज़र गए। अम्मी की जगह मैंने ले ली थी, और मेरी जगह मेरी बेटियों ने। फिर आया वह अनचाहा बदलाव, जब मोबाइल फ़ोनों के टावरों, और दूसरी वजहों से गौरैयों ने इंसानों से दूरी बना ली। एक दिन ख़्याल आया कि क्यों न एक बार फिर रूठे मेहमान को बुलाया जाए।

मैंने अपनी बेटियों के साथ घर के सबसे शान्त कोने में दाना-पानी रखा, घासफूस से बना एक नकली घोसला भी टांग दिया। चिड़ियों को किसी भी तरह छूने या उनके पास न जाने की, अम्मी से मिली हिदायत मैंने अपनी बेटियों को सौंप दी थी। दूसरी सुबह मेरे साथ-साथ, मेरी बेटियां भी कौतूहल से उस कोने में झांक रही थीं। मगर हम तीनों के हाथ मायूसी ही आई। वहां सन्नाटा था। दाने ज्यों-के-त्यों पड़े थे।

‘‘मम्मा, अब क्या होगा? चिड़िया तो आई नहीं।’’ छोटी बेटी की जिज्ञासा से चिंता झलक रही थी।

‘‘आएगी बेटा, दाना-पानी रखती रहो।’’ 

उसे तसल्ली देते वक़्त मेरे दिल में भी संशय था कि पता नहीं तथाकथित प्रगति की बलि चढ़ी गौरेया लौटेगी या नहीं। दिन गुज़रे, फिर दो हफ़्ते।

फिर अचानक एक दिन, बालकोनी से चूं-चूं की आवाज़ें आईं। आहिस्ता से झांककर देखा तो गौरैयों का परिवार हमारी मुंडेर पर दाने चुग रहा था। हम तीनों दम साधे वह दृश्य देखते रहे। अगली सुबह फिर से वही नज़ारा, और उसके अगले दिन भी।  नानी से मिली सीख मेरी बेटियों ने भी अपना ली थी। इसीलिए दोनों उनके लिए दाना-पानी तो रखतीं मगर बिना उन्हें छेड़े। और फिर एक दिन मैंने देखा कि एक नर और मादा गौरया हमारे लगाए घोसले में तिनके-तिनके जोड़ रहे हैं। बात साफ़ थी, उनके घर नया मेहमान आने वाला था, और इस काम के लिए उस जोड़े ने हमारे घर में आशियाना बनाया था। रूठी गौरैया की हमारे घर वापसी हो चुकी थी। बस, तब से लेकर आजतक, हमारे परिवार की नींद चूं-चूं की आवाज़ से ही खुलती है और हमारे घर में उनका राशन भी पूरी पाबंदी से आता है। 

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