Sunday, 1 June 2025

बैना

 

बैना: आधुनिकता की भेंट चढ़ती एक प्यारी सी सामाजिक परंपरा

दरवाज़े पर दस्तक होती है। बाहर लाल कपड़े से ढकी एक थाली लिए कुछ बच्चे खड़े हैं।

कई बच्चों के हाथों में वैसी ही सजी हुई थालियाँ हैं—मिठाइयों, फलों, और घर की बनी कुछ खास चीज़ों से भरी हुई।

कहाँ से आए हो बेटा?”

राजेंद्र चाचा जी की बेटी, निशा दीदी, अपने ससुराल से आई हैं। चाची ने बैना भेजा है।” बच्चे थाली थमाते हैं, मुस्कुराते हुए कहते हैं, “चाची/दीदी/भैया, अभी बहुत जगह जाना है।”

और फिर, रिश्तों के brand-ambassador वह बच्चे आपस में बात करते हुए आगे बढ़ जाते हैं—“अब फलाँ-फलाँ घर जाना है।”

जिस-जिस घर में बैना पहुँचता है, वहाँ-वहाँ उत्सुकता और खुशी की मिली-जुली लहर दौड़ जाती है।

कौन लाया?”, “क्या-क्या आया?”, “कहाँ से आया?” जैसे सवाल हवा में तैरने लगते हैं।

और फिर शुरू होता है बैना हथियाने का सिलसिला—किसी को पेड़ा चाहिए, किसी को केला, किसी को नमकीन।

लेकिन बैना सिर्फ एक थाली नहीं है। यह संबंधों का एक संदेश है। शायद इसीलिए, अक्सर इसे सन्देस भी कहा जाता है। सौगातों से भारी यह थाली तुरंत लौटाई नहीं जाती। इसे स्नेहपूर्वक भरकर भेजा जाता है। अगर लाने वाला तुरंत वापस माँग ले, तो बिना धोए लौटा दी जाती है—कहते हैं, धोने से ‘प्यार’ धुल जाता है।

बैना receive करने के बाद शुरू होता है अगला चरण—बैना भेजने वाले परिवार के आगंतुकों से मिलने जाना, उन्हें घर आमंत्रित करना। यह अक्सर किसी दावत, चाय-नाश्ते या कम-से-कम एक औपचारिक return-मुलाक़ात तक जा पहुँचता है। सोचिए, एक थाली से शुरू हुई यह कहानी कितनी दूर तक जाती है। वह इसलिए कि बैना केवल थाली नहीं, सामाजिक ताने-बाने को जोड़ने वाली एक डोर है, एक ऐसी परंपरा है, जिससे अपनापन ज़िंदा रहता है।

लेकिन अफ़सोस, यह परंपरा अब धीरे-धीरे इतिहास बनती जा रही है।

गाँवों, कस्बों और छोटे शहरों में इसके कुछ अंश ज़िंदा है, मगर शहरी जीवन की भागदौड़, अपार्टमेंट की दीवारों और डिजिटल संवादों ने इस परंपरा को लगभग भुला दिया है। जब एक ही अपार्टमेंट में रहने वालों को यह नहीं पता कि बगल वाले फ्लैट में वर्मा जी रहते हैं या शर्मा जी, तो फिर बैने की थाली और रिश्तों की मिठास कहाँ टिकेगी?

डिजिटल chocolate, डिजिटल मिठाइयों और डिजिटल बधाइयों के बाद अब बस डिजिटल बैना ही देखना बाकी रह गया है।  

क्या हम इसे बस यादों में ही इसे संजोकर रखेंगे?


 


 

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